केतु का प्रभाव और कार्य
छाया ग्रह के रूप में केतु: केतु को एक 'छाया ग्रह' माना गया है जो जीवन में विस्तार (expansion) और कर्मों के फल देने का कार्य करता है। यह पूर्व जन्म और वर्तमान जन्म के कर्मों के हिसाब-किताब से जुड़ा है।
अनस्किल्ड लेबर और शनि का संबंध: वक्ता के अनुसार, जीवन के सुख-दुख के फैसले शनि के निर्देश पर होते हैं और केतु उनके अंतर्गत कार्य करता है। इसे अक्सर हमारे जीवन के उन अनचाहे या अनजाने कर्मों से जोड़ा गया है जिनका हमें तुरंत पता नहीं चलता।
शिक्षा और ज्ञान का द्वार: केतु को शिक्षा का द्वार बताया गया है। यदि व्यक्ति सीखने और जानने के लिए तत्पर है, तो केतु उसके माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने में सहायक होता है।
स्वास्थ्य और शरीर पर प्रभाव: केतु का संबंध शरीर के विशिष्ट अंगों जैसे कि कमर, रीढ़ की हड्डी, घुटने, पैर और प्रजनन अंगों (sexual parts) से है। यदि जीवन में इन अंगों से संबंधित समस्याएं या बीमारियां चल रही हैं, तो यह केतु के प्रभाव या असंतुलन का संकेत हो सकता है।
चेतना और संतुलन: वक्ता ने जोर दिया है कि केतु के सकारात्मक परिणामों के लिए व्यक्ति को अपनी 'कमांड्स' (दुआएं या बद्दुआएं जो हम अनजाने में दूसरों को देते हैं) के प्रति जागरूक होना चाहिए। अगर हम अपने कर्मों में स्पष्टता रखते हैं, तो हमें बाहरी रूप से मांगने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
केतु का विभिन्न स्थितियों में प्रभाव
सूर्य और चंद्रमा के साथ: जब केतु सूर्य के ऊपर आता है, तो व्यक्ति जीवन में अंधकार महसूस करता है, और चंद्रमा के साथ होने पर यह मन को दबा देता है।
मंगल के साथ: यह स्थिति बहुत प्रभावशाली होती है। इसे 'आग के साथ धुआं' कहा गया है, जो प्रचंड ऊर्जा का प्रतीक है।
बृहस्पति (गुरु) के साथ: यह सबसे उत्तम स्थिति मानी गई है। यदि केतु को गुरु का मार्गदर्शन (सिर) मिल जाए, तो यह अद्भुत ज्ञान और पूर्णता प्रदान करता है।
शुक्र के साथ: शुक्र के साथ केतु गाय की सेवा, इत्र, और वैभव से जुड़ता है। यह स्थिति जीवन में उल्लास और सुख लाने वाली हो सकती है।


